हम पानी की बात करते-करते दसवे वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। अन्तर्राष्ट्रीय जल संरक्षण दिवस पर 22 मार्च 2010 को हमने ‘शिवम् पूर्णा’ का घोषणा पत्र भरा था, जो शिव ‘गंगा’ को शीश पर धारण करते है इसलिए गंगाधर कहलाए, उन्हीं ‘शिव’ के मुकुट चन्द्रमा की बेटी है ‘पूर्णा’ जो जग कल्याणकारी होने के कारण ‘शिवम् पूर्णा’ कहलाई। भारत के मध्य बिन्दु बैतूल जिले से पश्चिम वाहिनी नदी ताप्ती की प्रमुख सहायक नदी है ‘पूर्णा’। ‘शिवम् पूर्णा’ देश भर की नदियों की (जल की) प्रतिनिधि पत्रिका है। जिसमें हम सिंधु से लेकर साबरमती, गंगा से लेकर महानदी, नर्मदा से लेकर ताप्ती, गोमती से लेकर कावेरी, ब्रह्मपुत्र से लेकर दामोदर तक नदी संदर्भ के सभी प्रश्नों को और उनके समाधानों के लिए आतुर है, तत्पर है।
हम जल के बल पर ही पहँुचे हैं जलते प्रश्नों के तल पर, जिन्हें हम नहीं टाल सकेंगे कल पर। जब नदियों का दम घुट रहा हो, तब उनके प्रदूषित होने के मुख्य कारणों को जानना होगा, तभी हम समाधान के द्वार तक पहुँचेगे। बहुतेरी नदियों का जल प्रदूषित होने का अर्थ ही यह है कि हमारी जीवन प्रणाली (विशेष रूप से नगरीय सीवेज-व्यवस्था) का उचित उपचारात्मक प्रबन्धन न होना। जब नदियों में सीधे मल-जल मिल रहा हो तब हल कैसे निकलेगा। कल-कारखानों का अपशिष्ट (कचरा) भी नदियों में, रही सही प्रदूषण की कमी को दूर करता है, आशय यह है कि यमुना जैसी कई नदियाँ कुछ विशेष भाग से अपना अस्तित्त्व खो चुकी है, इन सब के विपरीत अच्छे परिणामों के लिए दृढ़ इच्छा शक्ति की आवश्यकता है। गुजरात की साबरमती नदी इसका एक जीवंत उदाहरण है, वर्षों से सूखी पड़ी नदी साबरमती आज जल से लबालब है, नौ साल में 1150 करोड़ रूपएं खर्च कर सूखी नदी-सदा नीरा नदी में बदल गई है। नदियों को पावन और मनभावन बनाए रखने के लिए नदियों में सीवर(मल-जल) का प्रबल प्रवाह सख्ती से रोका जाना चाहिए, तभी नदियाँ आचमन के योग्य बनी रहेगी। साबरमती नदी को पुन: सदानीरा बनाए रखने में उक्त निर्णय लिए गए, साबरमती के दोनों किनारों पर समान्तर एक बड़ी पाईप लाइन के जरिए सीवेज को आधुनिक ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़ा गया है यही प्रणाली हमें अन्य बड़ी नदियों के लिए अपनानी होगी। इसके साथ जल की मितव्ययिता संतुलित और सम्यक वितरण जल की सार्थकता है। हम इस निष्कर्ष पर पहँुचे है जिस तरह साबरमती को नर्मदा नदी की लिंक नहर से जोड़ा गया है वह अन्य नदियों के लिए एक अनुकरणीय आदर्श हैं।
जल के संदर्भ में हमें प्रथम जल आमंत्रण की कला भी सीखनी होगी। गीता के तीसरे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया हैं कि –
अन्नात्, भवन्ति, भूतानि पर्जन्यात् अन्न सम्भव:।
यज्ञात् भवति पर्जन्य: यज्ञ: कर्मसमुद्रभव:।।
सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते है, अन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है, वृष्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ विहित कर्मों से उत्पन्न होने वाला है। यह प्रमाणिक है कि जल,वर्षा यज्ञ से प्रेरित है उसके बाद वन भी वर्षा को आमंत्रित करते है, वर्षा के लिए हमें अतीत से भी सीख लेनी होगी। वर्षा के लिए वन की अपनी भूमिका है। बड़ी बात यह है कि वर्षा जल को कुँए, तालाब, बावड़ी में संग्रहित किया जाए, उसे धरती में छिपाने की जितनी तत्परता होगी उतना ही जल का स्तर ऊपर आएगा। हमें अनिवार्य रूप से जल को धरती के कंठ में डालना ही होगा तभी धरती की प्यास बुझेगी तभी हमारा समाज तृप्त होगा।
किसी एक विधा को समर्पित पत्रिकाएँ विधा विशेष के साथ-साथ विषय व कथ्य विशेष की सीमित चादर ओढ़ लेती है तब उसमें जीवन की समग्रता अपनी अभिव्यक्ति पाने में असमर्थ रहती है, हमारा मानना है कि कोई छन्द / विधा / फार्म(काव्य रूप) का अपना प्रवाह है, आकार है, प्रकार है, उसकी लय है पर उनमें सबसे ऊपर होती है समय की आवाज, उसकी भावाभिव्यक्ति, आवेग और उसकी मर्मस्पर्शी क्षमता जो हमें दुष्यंत कुमार सम अनेक कवियों मेें परिलक्षित हुई है। इसीलिए पर्यावरण के पंचघटक में से एक ‘जल’ को केन्द्र में रखकर भौतिक जल के साथ-साथ साहित्य, समाज व शिक्षा के उतरते पानी की खोज खबर भी ‘शिवम् पूर्णा’ की बहुआयामी आकुलता है। हम ‘शिवम् पूर्णा’ के सभी आत्मीय शुभचिन्तकों को आश्वस्त कर देना चाहते है कि ‘जल’ को बहुसंख्य रूपकों में, प्रतीकों में, अर्थों में विस्तारित किया जाता रहा है, हम भी ‘जल’ रूपकों (करूणा का जल, भक्ति का जल, स्वाभिमान का जल आदि शाश्वत मूल्यों के जल) की लम्बी डगर पर चल पड़े हंै।

‘शिवम् पूर्णा’ का 38 वॉ अंक (अप्रैल 13) आपके सामने है, आकाश से शब्द, वायु से स्पर्श, धरती से गंध व अग्नि से रूप की अभिव्यक्ति होती है। वैसे ही जल से ‘रस’ का अवतार होता है। रस के कई अर्थ हैं, संदर्भ है, पर मुख्य रूप से रस, आनन्द का पर्याय है। आनन्द का सम्बन्ध भी नाद से है, नद से है, नदी से है। नाद से शब्द जुड़ा है और शब्द से अर्थ और व्यंजनाएँ। शब्द-शब्द में गुँथी लय ही गीत का आकार लेती है, गीत जो ताल छंद से साकार होते है, अत: जल गीत का ही पर्याय है। जल का अपना संगीत है, जल से जुड़े साज हैं जिनकी तरल आवाज है जैसे जल तरंग जल से तरंगायित है। जल कहाँ नही है, और जल जहाँ नहीं है वहाँ कुछ भी नही हैं। शब्द के दोने (प्याले) से ही भाव का रस छलकता रहता है।
समुद्र शिव है जो धरती का गरल भिन्न-भिन्न नदियों से(जल स्रोतों से) पीते रहते है। समुद्र शिव अपने शीश से गंगा को वाष्प में बदल देते है और वायु के भागीरथी उन्हें आकाश पथ पर फैला देते है। आकाश में वही वाष्प मेघमाला बन आकाश गंगा के रूप में दमकती, चमकती और बरसती रहती है।
हेल में, मेल में, जीवन के हर खेल (तैराकी) में जल की झल है। इसीलिए ‘शिवम् पूर्णा’ का केन्द्रीय भाव जल है। मृत प्राय: स्थिति/ क्षेत्र/ समाज के लिये जल अमृत है। उखड़े-उखड़े जन-जीवन के लिए जल संजीवन है। जो जल चमक है, जन संस्कृति की दमक है, जो जल गीत सुमन की गमक है, रस चषक है, इसीलिए जल आगे-आगे और हम सब जल के पीछे-पीछे है कभी भूजल के ऊपर तो कभी-मेघों के नीचे है, भागीरथी से कुछ बिरले ही है जो नदी के आगे-आगे है और नदी की जलधार उनके पीछे-पीेछे भागे है।
प्रकृति के साथ छेड़ छाड़ का खामियाजा हमेशा जग-जीवन को ही उठाना पड़ता है, और कभी-कभी तो प्रकृति अपनी प्रतिक्रिया अति भयानक रौद्र रूप में देती है। विगत दिनो आएँ भूकम्प ईरान, अफगानिस्तान-पाकिस्तान और चीन ( कुछ-कुछ भूभाग भारत के भी) में जन-धन को क्षति पहँुचा चुके है। कई बार ऐसी स्थिति युद्ध में भी नहीं होती जितनी प्रकृति के क्रुद्ध होने में हो जाया करती है।
हम विगत वर्ष के अंकों में कह चुके है कि ‘पानी के लिए युद्ध नहीं होगा बल्कि पानी ही क्रुद्ध होगा और होता रहा है। बाढ़, सुनामी, आँधी, अतिवृष्टि पानी के क्रुद्ध रूप हैं।’ महाराष्ट्र राज्य के कई इलाके सूखा ग्रस्त हैं। जल का अभाव ही सूखा है। जल(रस) के बिना जीवन रूखा है तब फसलों के अभाव से जन-जीवन भूखा है, दूर-दूर तक ग्रामीण जन पानी के लिये भटक रहे है। यह वर्षा की उदासीनता है, अनुदारता है। यह अनुदारता ही पानी की दूसरी तरह की क्रुद्धता है। जल तत्त्व अति प्रतिक्रियावादी तत्त्व है। आप उसके साथ जैसा व्यवहार करोंगे वह भी ठीक वैसा ही व्यवहार आपके साथ करेगा। प्रकृति ने जिस उदारता से हमें जल दिया है उसके विपरीत हम मनुष्यों द्वारा निर्मित बाजार ने पानी को कैद कर बोतल में बदल दिया है। महाराष्ट्र का सूखा अनावृष्टि/अल्पवृष्टि का प्रतिबिम्ब है और प्रकृति की यह क्रूरता परोक्ष रूप से युद्ध ही है। बाढ़ और सूखा प्रकृति के अस्त्र है, हमारी मंगलकामना है। पानी के लिए युद्ध न हो, पानी, सागर, बादल में अवरूद्ध न हो पानी (प्रकृति) हम पर क्रुद्ध न हो, जग-जीवन के लिए पेय जल सुलभ हो शुद्ध हो, इस सार्थकता के लिए हमारी चेतना सम-बुद्ध हो।
जन-जन में जल-जन जागरण हेतु गाँधी शांति प्रतिष्ठान में जल-जन जोड़ो अभियान विमर्श हुआ जिसमें देश के जल पर काम करने वाले विज्ञ, सामाजिक कार्यकत्र्ता जल साक्षरता कर्मी, जलविज्ञानी आमंत्रित थे फलस्वरूप जल मंथन में जो मुख्य बिन्दु (निष्कर्ष के मोती रत्न) निकल कर आए उसमें मुख्य रूप से जन-जन के मन में सही जल समझ पैदा हो, कम पानी में पैदा होने वाली फसलों को बढ़ावा मिले। तीसरा प्रमुख विचार जल की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए काम करने की जरूरत है। जल स्रोतों को दूषित होने से बचाए रखने से व्यापक जल-साक्षरता(जागरण) चलाने की आवश्यकता है। इस देश व्यापी जल आन्दोलन से राष्ट्र की युवा शक्ति को जोडऩा होगा तभी यह परम आवश्यक अभियान अपनी सार्थकता पा सकता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता जलपुरूष राजेन्द्र सिंह ने की।
पानी जिस संग में रहेगा उसी रंग व उसी ढ़ंग का हो जाएगा। उसका चित्र वैसा ही दिखेगा और वैसा ही उसका चरित्र हो जाएगा। अगर उसकी मर्यादा रखोगे तो वह सुमित्र हो जाएगा। निर्मल पानी अमृत ही है, पानी निर्मल रहेगा तभी हमारा समाज निर्मल होगा। पानी पर तरह-तरह की गंदगी का भार है, कहीं-कहीं वह बहुत लाचार है, इसीलिए वह अशक्त है बीमार है। उस पर कई तरह की मार है। बीमार पानी का उपचार हो, इन सब बातों के लिए आप के मन में भी कुछ विचार हो, कुछ आचार हो और हमारे इस उपक्रम की भी यही मंशा है कि इन भाव तरंगों का दूर-दूर तक जन-मन में संचार हो। कुछ विचार आचार में बदल कर संचार करते भी है पर यह प्रयास बहुत कम है। तभी हम बेदम है, और स्थितियाँ बहुत विषम है। जन चेतना के संदर्भ में कई गीत भागीरथी हमारे साथ खड़े है ।

नदी का नाम बहती जलधारा है, कभी एक नदी चीन में ‘सांगपो’ के नाम से जानी जाती है वही नदी भारत में ‘ब्रह्मपुत्र’ कहलाती है। कभी कोई नदी जाने कितने-कितने नामों से पुकारी और गायी जाती है। कभी कोई नदी किसी नगर को अपना नाम दे देती है, अपनी पहचान दे देती है; जैसे नागनदी के कारण नागपुर नगर देश में जाना जाता है। खाम नदी के कारण खाम गाँव के नामकरण संस्कार हुआ। यमुना नदी से यमुना नगर और गंगा से गंगा नगर जाने जाते है। उत्तरप्रदेश में सोनभद्र नदी के नाम पर सोनभद्र जिला अस्तित्व में आया वैसे ही गुजरात में नर्मदा नदी के नाम पर नर्मदाजिला और ताप्ती नदी के नाम पर तापी जिला मानचित्र पर उभरा। कभी-कभी अपराजेय पौरूष पराक्रम त्याग तपस्या से सम्मोहित हो अनुगमन करती हुई नदी भागीरथी (भागीरथ के कारण) हो जाती है। आशय यह है कि त्याग तपस्या से प्रभावित हो नदी भागीरथ का नाम धर लेती है, कभी अपना नाम शिव को दे देती है तब वे गंगाधर कहलाते है। नदी केवल अपना नाम ही विलोपित नहीं करती वरन् अपना पूरा कि पूरा अस्तित्व सागर में समर्पित कर अपने भीतर शेष रही अहमन्यता का विसर्जन भी कर देती है। यही नदी की सार्थकता है पूर्णता भी। ‘पूर्णा’ भी लगभग तीन सौ कि. मी. की यात्रा कर ताप्ती नदी को अपना अस्तित्व सौप देती है।
नदी केवल और केवल बहना जानती है और कुछ जानना उसकी प्रकृति में नही है कि वह किसी क्षेत्र में बहती है, प्रदेश, देश की स्थिति का उसे भान नही है। नदी के बहने का अर्थ अपने भीतर का नेह लुटाना है, चाहे उस प्रवाह पथ में कोई भी मिले गाँव, नगर, जंगल, पर्वत, वह सब की प्यास बुझाती है, सबको पास बुलाती है। वह कभी कहीं नहर लहर बन दूर-दूर खेतो के संग बतियाती है। नदी यह भी नही देखती है कि उसके पानी का जन-जीवन कितना पानीदार उपयोग करता है? जग-जीवन के लिये नदी अहर्निश समर्पित है पर मनुष्य (समाज) नदी के पानी का दोहन (शोषण) करने के बाद भी नदी को नहीं छोड़ता वह उसे गीले कपड़े की तरह निचोड़ता है। जब नदी का पानी चुक जाता है तब उसकी रेत पत्थर से अपना संसार सजाता है। हम मनुष्य सर्वाधिक संवेदनशील माने जाते है पर यह यथार्थ है कि हम औसतन जड़ और तटस्थ बने रहते है।
पूरे ब्रह्माण्ड में उसी ग्रह पर जीवन है जहाँ पर जल है, जब पृथ्वी पूरी तरह से जल ग्रह है, जिसके लगभग 71 प्रतिशत भू-भाग पर जल है और मनुष्य के शरीर में 70 प्रतिशत जल है तब यह सत्यापित होता है कि अब तक के सारे साहित्य सृजन में भी 70 प्रतिशत जल साहित्य लबालब होगा। इन्हीं सशक्त आधारों पर हमने ‘शिवम् पूर्णा’ के प्रकाशन का शुभारम्भ किया है आशय यह है ‘शिवम् पूर्णा’, पूर्णा नदी से उद्गमित होकर आप तक पहँुच रही है। अपेक्षा यही है कि आप भी इस ‘नदी-संवेदना-जल’ से आचमन कर अपने आसपास की नदी, सरोवर, तालाब, कुएँ, झरने व जल स्रोतों के उद्धार की साधना कर सके या अपने भीतर ही बहती संवेदनाओं की नदी को जगाएं, बढ़ाएं। अपने भीतर बहती गुम होती नदी को पुकारे, भीतर ही कहीं झरते नेह के झरने की झर-झर सुने; करूणा के हिलोर लेते सरोवर को गुनेे, भीतर ही कहीं छलकते प्रेम घट से गाँव, नगर के पनघटों की हलचलों को जीवन्त करे क्योंकि हमारे भीतर सौहाद्र्र समन्वय सहयोग सेवा जैसे मूल्यों को राष्ट्रीय जन-जीवन के आचरण में देखने की सामूहिक बेचैनी हैं। हमारी चाह की नज़र पैनी है क्योंकि 5 जून पर्यावरण दिवस के सन्दर्भ में सबसे पहले हमें भीतर सोई संवेदनाओं को जगाना है।
विगत वर्ष (दैनिक जागरण के अनुसार) फ्रांस में आयोजित विश्वजल फोरम में 150 देश के 20 हजार से अधिक जल-चिन्तकों ने भाग लिया जिसमें पेय जल सिंचाई पानी की खेती व नगरों में पेय जल स्वच्छता व स्वच्छता के अधिकार पर मंथन हुआ। सम्मेलन में व्यापक सहमति बनी कि पानी लाभ के लिए नहीं है। यह एक प्राकृतिक संपत्ति है, इस पर सब का बराबरी का अधिकार है। जल संकट की आड़ में कई लोभी कम्पनियाँ पानी की व्यवसायीकरण की वकालत भी कर रही थी वहीं सामाजिक कार्यकर्ता पानी के व्यापार का विरोध भी कर रहे थे। दुनिया में पानी का सालाना करोबार 1 लाख करोड़ रूपये से भी अधिक है। यह कम्पनियाँ झील, नदी, पर्वत, झरने को अपने अधिकार में कर रही है। भारत में एक बोतल पर कम्पनियाँ लगभग 10 रूपये का मुनाफ कमाती है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी पानी को कर से मुक्त रखा गया था। हमारी दिनचर्या पानी की प्रतीक्षा और प्रबंध में गुम है। कहीं-कहीं नल-देवता के आगे बाल्टी, प्लास्टिक, कनस्तर, पीपे आदि की लम्बी कतार हैं और पानी का इंतजार है, लोग बेजार है। यह पानी कई बार हमें पानी-पानी कर देता हैं। कई बार हमारे धैर्य का पानी उतार देता है, यह पानी अच्छे-अच्छों को पानी पिला देता है। हमने ही नहीं आपने भी अच्छे-अच्छों को कई जगह ‘पानी’ भरते देखा होगा। दूसरी तरफ जल बिक रहा है, यह हमारी जल प्रबंधन नीति की भारी विफलता है, इस पर पुनर्विचार, मंथन और क्रियान्वयन आवश्यक है। इसीलिए देश के शीर्ष पंक्ति के सामाजिक कार्यकर्ता(राजेन्द्र सिंह आदि), स्वयंसेवी संगठन जलाभाव के क्षेत्रों में अपनी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
यह यक्ष प्रश्न रक्त बीज की तरह फिर हमारे सामने उपस्थित है जल व पेय जल की उपलब्धता सार्वभौमिक, सर्वजनीन कैसे बनी रहे, इसका सार्वकालिक और सर्वमान्य समाधान है, जंगल का मंगल गीत, आशय वृक्षों से प्रीत, (वृक्षारोपण) तभी होगी निकट हमारे जीत, तो आओं पर्यावरण मीत, सजाए हम यह जीवन संगीत, हरियाली से हरित, वर्तमान और जल के अभाव का हो अतीत, हमें तो बोध यही हुआ, तुम्हें भी होगा यही प्रतीत। आदरेय पंकज श्रीवास्तव का मूल मंत्र है कि ‘जहाँ जंगल घना है पानी वहीं बना है’ वहाँ जीवन सीना तानकर तना है, यह विश्वास घना है।